Monday, 29 December 2014

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं

है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये व्यवहार नहीं -- @aditya

Monday, 15 December 2014

प्यारी माँ मुझको तेरी दुआ चाहिये ।
तेरे आँचल कि ठण्डी हवा चाहिये ।
लोरी गा गाके मुझको सुलाती है तुं ।
मुस्कुराकर सवेरे जगाती है तु ।
मुझको इसके सिवा और क्या चाहिये ।
तेरी ममता के साये मेँ फुलुं फलुँ ,
थामकर तेरी अगुलीँ मै बढती चलुं ।
तेरी खिदमत से दुनियाँ मे अजमत मेरी,
तेरे पैरोँ के नीचे है जन्नत मेरी ।
आसरा बस तेरे प्यार का चाहिये ।
प्यारी माँ मुझको तेरी दुआ चाहिय

ओ कंप्यूटर युग की छोरी
मन की काली तन की गोरी
करना मुझको माफ़
मैं तुम्हें प्यार नहीं कर पाउँगा
तू फैशन tv सी लगती
मैं संस्कार का चैनल हूँ
तू मिनरल पानी की बोतल लगती है
मैं गंगा का पावन जल हूँ
तुम लाखों की गाड़ी में चलने वाली
मैं पाँव पाँव चलने वाला
तुम हैलोजन सी जलती हो
मैं दीपक सा जलने वाला
करना मुझको माफ़
मैं तुम्हें प्यार नही कर पाउँगा
तुम रैंप पर देह दिखाती हो
मैं संस्कारों को जीता हूँ
जब तुम्हें देख कर सिटी बजती
मैं घूँट लहू का पीता हूँ
तुम सूप पीने वाली
मैं मट्ठा पीने वाला हूँ
तुम शॉक अलार्म से भी ना डरो
मैं पॉपकॉर्न से डरने वाला
तुम डिस्को की धुन पर नाचो
मैं राम नाम ही जपता हूँ
तुम पिता जी को डैड और टेलीफोन को भी डेड
कहो और माँ को मम्मी(mummy) बुलाती हो
तुम करवा चौथ भूल बैठी और वेलन टाइम डे
मनाती हो
तुम पॉप म्यूजिक की धुन सी बजती
मैं बंसी की धुन का धनि-या
मुझ से डॉट कॉम भी ना लगती
तुम इंटरनेटी दुनिया
तुम मोबाइल पर मैसेज लिखने वाली
मैं पोस्टकार्ड लिखने वाला
तुम राॅकेट सी लगती हो और
मैं उड़ने वाला गुब्बारा सा
तू अपना सब कुछ हार चुकी
मैं जीता हुआ जुआरी हूँ
तुम इटली की रानी जैसी
मैं देसी अटल बिहारी हु
मैं देसी अटल बिहारी हु ..
तंग हो गए कपडे तो, लाज कहां से होए !अनाज होगए हाईब्रीड के तो, स्वाद कहां से होए !!नेता हो गए कुर्सी के तो देश का उद्दार कहां से होए !फूल हो गए प्लास्टिक के तो सुगंध कहां से होए !!चेहरा हो गया मेकअप के तो रूप कहां से होए !सम्बंध हो गए पैसो के तो प्रेम कहां से होए !!शिक्षक हो गए ट्युशन के तो विद्दा कहां से होए !भोजन हो गए डालडा के तो ताकत कहां से होए !!प्रोग्राम हो गए केबल के तो संस्कार कहां से होए !भक्त हो गए स्वार्थी तो भगवान कहां से होए !!आदमीं हो गया बुरी आदत का तो होश कहां से होए !अभिनेता नेता बन गए तो देश का उद्दार कहां से होए !!जनता आंख मूंद कर वोट दे तो अच्छी सरकार कहां से होए !जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला हो तो स्वच्छ लोकतंत्र कहां से होए !!